Sunday, February 14, 2016

उम्मीद


उम्मीद का तारा दूर गगन में , है सबको दिखता
लेकिन क्या वो तारा है मुझको तकता ?
जब भी देखूँ टिमटिमाते उसको 
आस करे गुदगुदी मुझको 
मानो आस हो उम्मीद की सखी 
संग संग जो खेले आँख मिचौली |

थाम कर हाथ आस का, जाऊं मैं उम्मीद को पकड़ने
चालाक उम्मीद बैठे छिप के खिड़की के पीछे 
खोल दरवाज़ा आहिस्ता , जाऊं मैं धीमे -धीमे 
दबे पाँव आस संग ढूँढूं मैं उम्मीद को 
बैठे जो दूर गगन में खिड़की के पीछे 

ज्यों ही खोलू मैं खिड़की 
त्यों ही उम्मीद मुस्कुराये 
और आस हिलौरें खाए |
तकूँ जब मैं दूर बैठी उम्मीद को
जानू मैं कही तो है इसको देखा पहले 
घुमा के नज़र देखूं जब आस को
तो पाऊँ ये तो है कुछ उम्मीद-सी 
आस लगे उम्मीद की परछाई |

समझ आये कुछ देर के बाद 
ओ बुद्धू ! ये उम्मीद ही तो है आस 
जो आस है, वही तो है उम्मीद 
जो लगे दूर वो सच में है पास 
बस नजरिये की है बात |

आज मिल कर उम्मीद-सी आस से
या यूँ कहूँ आस-सी उम्मीद से
हो रही है बहुत ख़ुशी 
क्यूंकि जिसको ढूंढा गली गली
मिली वो मुझको अपनी गली |




Öbrìgadò!
JJJ