Monday, September 19, 2016

धुंधली तख्ती




सुबह की चाय की प्याली 
से  उड़ती कुनकुनी भाप 
जब ठहर जाती मेरे चश्मे पर
धुंधला सा देने लगता दिखाई 
पर छूट ना पाती हाथ से प्याली 
दोस्ती की प्याली भी ना छूट पायी अब तक
जब धुंधला सी गयी है यादों की तख्ती 
क्योंकि पता है जब भाप होगी ठंडी
तब चल पड़ेगी यारों की कश्ती 

---सुरभि 


Öbrìgadò!