Tuesday, December 22, 2015

Tie the Title - मुन्नी और ब्रेड जैम

PREFACE 

There are a few stories which are written without any preface. With a blank yet fresh mind, you just pick up your pen after a very long long time to scribble just anything to cross-check, are you still a writer ?? :P 

So here I was in train#2991 exactly a quarter back travelling early in the morning in an almost empty coach. Ten minutes have passed by and the train had caught up the speed by then. Looking outside the window with a small bag resting on my lap, I was just thinking about nothing. All my train journeys uptil now have been heck boring and tiresome with just me with myself over the entire journey. Sadly this time also. "But hey, wait you are not alone today", my brain said. And my hand slid inside the bag to carry out the pen and paper. "So, ready for a surprise test??", my brain asked. I with no apparent emotions said ,"Ok lets try 'kuch alag' this time." My brain commanded,"Good girl! so prove that you still know how to write." I chuckled. But at the very next moment I quizzed myself and decided to break the frozen writer's block in this cold morning. Just like an extempore I started scrabbling in an impromptu manner of whatever I could think of because I just want to pass this test.

So ladies and Gentlemen, Dudes and Divas, Readers and Critics, I, Surbhi Bafna (the lost-writer-put-to-a-test) present you with my very own creation, my very own maiden short story in HINDI. Hell Yeah Guys!!!! A short story in Hindi. So stay relaxed, its no verbose this time, just a simple plain smooth read.

SPOILER ALERT - ** Don't jump to the end para right now. __/\__

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मुन्नी और ब्रेड जैम 

"मुर्गे आज कल कहाँ दिखते है? शहरों में तो उनकी बांग सुनना मुझे पिछले दो सालों से नसीब नहीं हुआ | अब तो बस चिड़िया की चहचहाहट से ही आँख खुलती हैं" दादी माँ अपनी दस साल की पोती को थपकी देकर सुलाते हुए बोली |

"ओह दादी! मुर्गे और चिड़िया सिर्फ बुजुर्गो को ही उठाते हैं | बच्चों के लिए तो अलार्म क्लॉक बनाई गयी हैं" पास में रखी घडी की ओर इंगित करते हुए पोती बोली |

"हां बेटा !ये सफ़ेद बाल कहते हैं मैं अब बूढ़ी हो गयी हूँ", नाक सिकोड़ते, होठों में अपनी हँसी दबाते हुए दादी बोली |

"बूढ़े लोगों की चिड़िया ,यंग लोगों की क्लॉक, हा s हा s हा ", दादी से अठखेलियां खेलती मुन्नी दादी की गोद में ही सो गयी|

प्यार से उसके बाल सहलाते हुए, दादी ने ध्यान से उसे पलंग पर लेटाया और मुन्नी का माथा चूमकर फुसफुसाई , " गुडनेट "|

दादी माँ ने ज़मीन पर अपनी चटाई बिछाई और भगवन का नाम जपते हुए सो गयी |

खिड़की से आती हलकी हलकी रोशनी ने सुबह की दस्तक दी | चिड़िया की चहचहाहट दादी माँ के कानों में कुछ यूँ गूंजी मानो कह रही हो ," उठ जाओ बूढ़े लोगों | तुम्हारा अलार्म क्लॉक जा रहा हैं अपना दाना ढूंढने |" दादी के शांत चेहरे पर मुस्कान की एक लकीर खींच गयी |

भिंची हुई आँखों को आराम से खोलते हुए दादी माँ ने भगवन को याद करते हुए हाथ जोड़े और निंदिया रानी की गोद में सोती हुई अपनी प्यारी पोती को देखा | कितनी शांत लग रही है यह शैतान, चुलबुली | मंद मंद मुस्कुराती दादी ने चटाई समेटी और निकल गयी कमरे से बाहर अपने दिन की शुरुआत करने|

"अम्माजी ! चाय तैयार है ", बहू ने रसोई में से आवाज़ लगायी| राख से मंजन कर दादी माँ ने रसोई घर की ओर रुख किया| गरम चाय की चुस्की लेते हुए दादी ने देखा आज फिर बहू ने मुन्नी के लिए सेन्डविच बनाने की ठानी है |आलू पतीले में उबल रहे थे और ब्रेड का पैकेट दूध के पैकेट के साथ बंद थैली से आलू को घूर रहा था |

बिंदनी !तू फिर से ये अंग्रेज़ों की डबल रोटी सेकने वाली है?

"क्या करुँ अम्माजी, दो दिन से आपकी लाड़ली जिद्द कर रही है| कल तो वह गुस्से में पूरा टिफ़िन वापिस ले आई| सारी रोटी सब्जी मुझे खानी पड़ी ," बहू रोनी -सी सूरत बना के मुन्नी की शिकायत लगाते हुए बोली | दादी ने ठहाका लगाया और बहू को समझाते हुए बोली, " अरे पगली ! तू क्या मुन्नी से डरती है ? अंग्रेज़ चले गए और ये डबल रोटी छोड़ गए | तुम्हारे ससुर जी ने अंग्रेज़ों को भगाया और तुम उनकी डबल रोटी को अपनी रसोई में शरण दे रही हो |"

हँसते हुए बहू बोली ," सॉरी अम्माजी ! आज फिर मुन्नी को आप ही समझाना |"

"बातों बातों में कब अलार्म बज उठा पता ही नहीं चला | सुबह का वक़्त बहुत जल्दी बीतता है, हैना?",अलार्म की पी s पी s सुन दादी ने बहू से कहा |

"जाइये शैतान को उठाने", आलूओं को गैस से उतारते हुए बहू बोली|

दादी माँ मुन्नी के कमरे में गयी और पुचकारते हुए बोली ," मुन्नी! ओ मेरी चुलबुल चिरैया | उठ जा|"

" हूँ s s s हम्म s s s "

"अरे ओ यंग जवान, उठो ,सुबह हो गयी है| आलाराम भी कब से बज रहा है |"

"दादी, अलार्म ! नोट आलाराम", नींद में मुन्नी बड़बड़ाई और अलार्म बंद करके फिर सो गयी|

"यंग जवान आजकल बूढ़ों से भी सुस्त है ?", दादी ने हलकी कड़क आवाज़ में प्रश्न किया|

मुन्नी फटाक से बिस्तर पर उठ बैठी और तपाक से बोली," दादी यंग जवान मतलब सोल्जर होता है और यंग मतलब जवान | आप दोनों को मिक्स कर रहे हो|"

दादी पोती की शरारतें घर को खिलखिला देती थी| घड़ी में ७ बज चुके थे | मुन्नी स्कूल ड्रेस पहनकर नाश्ते की मेज़ पर बिराज गयी |

"मम्मी !मम्मी !"

"हाँ बेटा, आई "

गरम गरम नाश्ता परोसते हुए माँ ने दादी को इशारा किया | दादी ने हाँमी भरते हुए सर हिलाया |"मैडमजी, आप अंग्रेजी बाद में सिखाना मुझे | वो क्या है ना मेरी बुद्धि कमज़ोर हो रही है | बूढ़ी हो गयी हूँ ना मैं| "

"ओह दादी ! कमओन | आप मेरी दादी हो | आप यंग मुन्नी की यंग दादी हो ", दादी की गोद में चढ़ते हुए मुन्नी बोली |

प्लेट में देशी घी का पराठा और दूध से भरा गिलास देखकर मुन्नी की शकल उत्तर गयी| वो कुछ ना बोली और रुआँसी सूरत बनाकर मम्मी की डांट दादी से लगायी|

"दादी ,मैं ये सब खाकर बोर हो गयी हूँ | आज प्लीज मम्मी को कहो ना ब्रेड जैम दे दे |"

दादी ने डांट लगाते हुए बहू से कहा ," क्यूँ बिंदनी ! ऐसा बेस्वाद खाना क्यूँ बनाया ?दे अपने यंग जवान को बासी खाना | क्यूँ तू फालतू जल्दी उठकर मेहनत करती है ?"

मुन्नी समझ गयी आज दादी, मम्मी की बजाय उसे डांट रही है |

मुन्नी फट से बोली ," दादी , सच में मुझे दूध पराठा नहीं अच्छा लगता | कभी कभी तो कुछ चेंज होना चाहिए ना | चलो आज आप भी मेरे साथ ब्रेड जैम खाओ| अगर आपको ना अच्छा लगे तो फिर मैं कल पराठा खा लूँगी|"

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तो फिर क्या हुआ आगे , क्या मुन्नी दादी को कन्विंस (convince) कर पायी ब्रेड जैम के लिए ? क्या दादी ने पोती-मोह में घुटने टेक दिए ? क्या कह रही है ये कहानी ? क्या कोई गहरा सन्देश छिपा है इसके अंदर ? आखिर क्या हुआ आगे ? क्यों कहानी में फोकस दादी -पोती के प्यारे रिश्ते से हट कर ब्रेड -जैम पर आ गया? जानने के लिए पढ़ते रहिये Vivacious Puerile |       

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P.S. When the spoiler alert says don't jump to the end para, some of the inquisitive readers cant resist themselves from bypassing the spoiler alert. So Guys, this is an INCOMPLETE short story. Sadly yes :( As I was put to a surprise test by my brain, I tried to put in all my efforts within a short span of 20 minutes (will tell you the why-20mins-story later) I was happy to write and win my brain's trust in me as a writer  (howsoever imperfect I'm). I tried to blend the subtle nuances of a daily morning in an ordinary Indian family with no apparent melodrama. I tried to capture a normal morning in some next-door family with the morning chores at pace. 

P.P.S. I apologize for an incomplete story and that too when it's my maiden short story. 
My Lord! Give me a chance to justify myself. So here I was in the train penning down in the surprise test when the train halted at the next station. A swarm of passengers buzzed inside the bogie and I was pushed aside towards the edge of the seat. (Yes, I willingly left my window seat). A lady in her late 40's sat beside me with her mother of short -stature, white hair and a lean body, may be in her late 70's who sat in the seat front of me. So yes, the grandmother in the story was drawn in from the old lady sitting in front of me. She was very jovial and I was happy to find a happy senior citizen J That's why my story carries no-extreme-sad and no-extreme-happy tone, just a complacent tone. 

Guys! when you sit in an overcrowded bogie, Oh pardon me, I forgot to mention, it was the Raksha Bandhan weekend, so you can imagine the capacity of an Indian General Class Compartment. So coming back to the story(why-20mins-story), as I was caught with the pen and paper by the Aunty (lady in her 40's) sitting next to me who was over-jovial (Indeed! she was, Ghosh!), she peeked into my test and snatched the paper from me as if the exam-over bell had rung. 
"Hi Beta! Are you writing something?? Can I see please??"
A modest me handed over my answer sheet to her. She read out loud a para (written till then) and the fellow passengers stared at me as if I had written something wrong. I felt outclassed (seriously). Just then, another newly married lady inquired, "Do you write?" As if asking if I'm a journalist or a columnist :P Oh!! how I wished to brag and boast had I had been the one but Alas! I wasn't. I said,"Yes, sometimes when I get bored." A silly answer indeed. And then the ladies and the grand lady didn't allow me to complete the story interrupting now and then to know the developments after dadi maa had woken up, after Bahu had served the tea. 

The train was speeding and so was the time unlike my story which had halted at the dining table with  a sad Munni and the aroma of desi ghee in the air . And the train finally jerked with me getting down at my destination carrying the leaflet of my maiden INCOMPLETE short story. 

After that, I tried to complete the story but I didnt know how to take the storyline forward. I couldn't think of taking off the conversation. Because the problem is - this is an over simple story with no melodrama, no preconceived notions. Yes, it is a tough task to pen down a plain story. 

The year 2015 is coming to an end and I want to complete this story before 2015 flies off. While posting this story here, I think I have been struck with some idea to carry it forward (I just think...). But still I would like to take your help to complete it. Yes, my dear Readers! I request you to pour in your suggestions and ideas for the plot. Lets see, where this simple story ends up. Even I'm also excited to see how do I end up, do I muddle the storyline or sail through smoothly. (fingers crossed , suggestions invited, wish to be triumphant \m/)


Öbrìgadò!
JJJ
 
:) :( ;) :D :-/ :x :P :-* =(( :-O X( :7 B-) #:-S :(( :)) =)) :-B :-c :)] ~X( :-h I-) =D7 @-) :-w 7:P 2):) :!! \m/ :-q :-bd ^#(^

1 comment:

  1. I will be waiting to read the complete story before 2015 ends. :)

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Don't leave before leaving your words here. I will count on your imprints in my blogspace. :)

Silly smiles Take you Miles.