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Monday

The Peapod


Pondering were you when I was brought home
And so was I.
Someone from the dustbin just met someone so rustic
Then began the story

Pencils were broken and papers were torn
But no word was scribbled
For you and I always scuffled

The epitome of goodness in you
Shadowed a little on me
Learning everyday from you
Fighting every quarter with you
I secretly wished to be just like you.

But you are only one
Who cannot be replicated
So emulated I, a little of you
Standing short under you

Enough of praises
enough of adulation
All sacked by you 
Spare a little for me
Or I will snatch

This is how a war was waged between this duo
Which often met truce of love
But bomb droppings continued till date
Regardless of how much destruction you have caused
You still remain the best nuclear arsenal
To whom I will never surrender

Gracias!
 

Tuesday

बुलंद


खुद को कर इतना बुलंद कि
हौंसलो की पतवार बन जाए
आंधी तूफान तुझसे डर जाये
और जो कोई  तेरे पथ में आये
काफिले में तेरे जुड़ जाये

नैया तेरी पार लगाने
और कोई नहीं
तू ही आएगा
ऐ बन्दे उठ
जल्दी से खे ले अपनी नैया

दूर किनारे कोई है खड़ा
शायद तेरे इंतज़ार में
बढ़ा हाथ मदद का
काफिला तेरे पीछे है खड़ा

पानी के उफान की ले मदद
नैया अपनी पार लगा
मुस्कानों से भरी वो निगाहें
खड़ी मिलेंगी तेरे स्वागत सत्कार में



Gracias!
 


Life is a chess


Blacks and whites
Only two colors to move
Life is a chess
With a different move 

Either the king or the queen
All protected by the pawns
I am a pawn amongst them all

To protect the king of dream
The queen of sheen
Go for  the next move,
For you are the pawn, the special pawn
The tiny pawn, the savior pawn

Life is a chess with me as the pawn
Let's make the move 
To protect the king
To save the queen
For you are the pawn, the savior pawn.



Gracias! 
 

Friday

छोटी -बड़ी जिंदगी


कहते है बहुत बड़ी है ये जिंदगी 
पर है बहुत छोटी

लम्बी इतनी कि बच्चे से बूढ़े बन जाए 
और छोटी इतनी कि बचपन की यादें आज भी हँसा जाए 

लम्बी इतनी कि बाल तक सफ़ेद हो जाए 
और छोटी इतनी कि शाम तक दाढ़ी उग आये 

लम्बी इतनी कि स्कूल कॉलेज ऑफिस सब में हो आये 
और छोटी इतनी कि एक प्याली चाय की सुकून से भी ना पी पाए 

लम्बी इतनी कि साथ के लिए एक हमदम ले आये
और छोटी इतनी कि उसका ठीक से साथ भी ना निभा पाए 

लम्बी इतनी कि सैकड़ों शुभचिंतको से मिल आये 
और छोटी इतनी कि नए पडोसी से मिल भी ना पाए 

लम्बी इतनी कि पैसो की बोरी भर जाए 
और छोटी इतनी कि उस पैसे से ख़ुशी न खरीद पाए 

लम्बी इतनी कि पोते - पोती के साथ खेलने लगे 
और छोटी इतनी कि बेटे - बेटी से दो लफ्ज़ भी ना कह पाए 

लम्बी इतनी कि पेटी भर ली कपड़ो से 
और छोटी इतनी की सारे भी ना पहन पाए 

लम्बी इतनी की भर -भर के दान दे आये 
और छोटी इतनी कि नुक्कड़ पे उस बूढ़े की मदद भी ना कर पाए 

लम्बी इतनी कि दांत भी गिर गए 
और छोटी इतनी कि उनसे एक गन्ना भी ना खा पाए 

लम्बी इतनी कि पूरी दुनिया घूम आये 
और छोटी इतनी कि अपने ही घर ना जा पाए 

जनाब ! अब आप ही बताएं कैसी है ये जिंदगी ?


Gracias!
 

Thursday

मेरी साइकिल


धूल की चादर ओढ़े  मेरी पुरानी साइकिल 
यूँ तांक रही थी मेरी राह 
जैसे गांव में बैठे बूढ़े बाबा 
सी रहे थे अपने परदेसी बेटे के आने की राह   

मेरे कदमों की आहट पहचान 
बिजली सी दौड़ी उसके ज़ेहन में 
फिर भी बूत बनी खड़ी रही  
धूल से चुप्पी ढ़की रही 

दुबक के बैठी थी कोने में 
मन मार रहा था झूम के हिलोरें
बरसों बाद लौटी थी उसकी सवारी 
लेकर साथ अपने एक मोटर गाड़ी 

डाली जब उसने एक नज़र अपने ऊपर
पाया खुद को बिलकुल धूल ग्रस्त 
पंक्चर टायर, उखड़ा पेंट, फटी सीट 
रुआंसी सी हो गयी बेचारी 
अब कौन करना चाहेगा उसकी सवारी ?

थक कर जब मैं लेटी खटिया पर
नज़र टिकी उस धूल भरे ढांचे पर
कौतुहल में देखा पास जाके
सकुचाई सी खड़ी थी मेरी साइकिल 

बल्लियों उछल रहे थे हम दोनों
अरसों बाद आज फिर मिल रहे थे 
लगा ली आज फिर गिलहरी से रेस 
छोड़ के पीछे मोटर - भैंस  J

                                                                         --- सुरभि बाफना 
 

Tuesday

रे मन



रे मन ! तू कितना चपल , कितना चंचल    
कभी इधर भागे , कभी उधर भागे 
एक जगह बैठ न तू पावै

रे मन ! तू कितना चपल , कितना चंचल
क्षण - प्रतिक्षण छलांग लगाए 
हर पल यूँ हिलोरे खाए 
तृष्णा की नैया में बस तू तैरता ही जावै

रे मन ! तू कितना चपल , कितना चंचल
अभी यह चाहे, कल वो चाहे 
हर पल चाह की सूचि तू बनाता ही जावै

रे मन ! तू कितना चपल , कितना चंचल
रमता रहे तू भूत - भविष्य 
आज में तू कभी स्थिर न हो पावै 

रे मन ! तू कितना चपल , कितना चंचल
पूरी - पकवान चाहे तू कितना ही खावै
भोग - विलास से तू उभर न पावै 

रे मन ! तू कितना चपल , कितना चंचल
तू कितना अधीर , ज़रा भी धीर न धरे 
बस चाहे पूरी होवै तेरी हर इच्छा 

रे मन ! तू कितना चपल , कितना चंचल
देख परायी ख़ुशी , चाहे तू भी वही ख़ुशी 
और इसी ख़ुशी की होड़ में 
बंधता तू चला जाये दुःख की डोर में 

रे मन ! तू कितना चपल , कितना चंचल
काहै न तू  धीर धरे ?
काहै  न तू पीर हरे ?

--- सुरभि बाफना 
 

Saturday

The light from a burning bridge

The quietly staring midnight moon 
From behind the turquoise drapes 
Sends the sneaking silver ray 
Reminding me of the last May

From the hamlet across the bridge 
You drew a perfect narrow ridge
To see the waning moon
Lying with the stars
Whilst sitting on the grass

Oh so beautiful the bridge it was
With the locks chained till far
The padlocks on both the sides
Made it a scene so blithe


The bridge couldn't carry the fetters
It burnt to burn the shackles
The padlocks jibbed wildly
With the fire engulfing wholly

The intense light from the burning bridge
Lit up the hamlet across the bridge
With the shimmering narrow ridge
The locks shrieked a clinking pitch

It's the best light cried the hamlet
Only to find the bridge burnt half
The padlocks clinkered half
The light rendered from the half

Half it burnt to burn again
For the best light?
Or half it burnt to level again
To mount the best light?

Gracias!
 

Sunday

वादा


जो मिलने का वादा करके 
न मिलने का बहाना बनाए 
समझ लेना दोस्त
वो वादों के मायने नहीं समझते 
और जो वादों को ना समझे 
उन्हें अपनी यादों में पनाह ना देना |

Gracias!
 

उस पार

उठा यादों का बस्ता  
चल पड़ा मैं वही रस्ता
जहाँ चाय की चुस्की 
में छुपी थी मेरी ख़ुशी 
ख़ुशी रोज़ उससे मिलने की
जी भर के बतियाने की 
हवा में ख्वाबों को बुनने की            


रस्ता नहीं बदला पर शायद वक्त बदल गया 
वक़्त के साथ हम बदल गए 
और हमारे साथ ख़ुशी के मायने भी 
दो आने के कंचों से ऊँचे मंचो तक पहुँचने की होड़ 
और तभी पीछे छूट गयी हमारी वो प्यारी सी हँसी 

फेसबुक व्हाट्सएप्प पे ढूंढने लगे बिछड़े यारों को 
पर अब सब कुछ सिर्फ लाइक्स और कमैंट्स तक ही सिमट गया
खोया यार मिलके भी मिल न पाया 
और मैं चाह कर भी उसे याद दिला न पाया

उसकी जिंदादिली और बेकार चुटकुले ही तो थे 
जो मुझे खींचकर वापिस उस तक लाये थे 
पर जैसे वो समय से रेस लगाने में लगा हुआ है
अपनी ख़ुशी छोड़ दूसरों को खुश करने में लगा हुआ है  

देख कर बदला यार 
न जाना चाहा मैंने उस पार
उठा अपना बस्ता 
टटोला यादों का गुलदस्ता 
देख जहाँ अपना पुराना यार 
जाना चाहा मैंने फिर उस पार


Gracias!
 

Monday

धुंधली तख्ती




सुबह की चाय की प्याली 
से  उड़ती कुनकुनी भाप 
जब ठहर जाती मेरे चश्मे पर
धुंधला सा देने लगता दिखाई 
पर छूट ना पाती हाथ से प्याली 
दोस्ती की प्याली भी ना छूट पायी अब तक
जब धुंधला सी गयी है यादों की तख्ती 
क्योंकि पता है जब भाप होगी ठंडी
तब चल पड़ेगी यारों की कश्ती 

---सुरभि 


Öbrìgadò! 



 

The Shades and the Brush


Packed was I in a small crystal clear bottle, I was its identity
The blue bottle, the red one or the green goblet
Though when around you all time, I am not given fame
My fame comes with my name
But where is my name?

The flower is adored for its vibrant delicacy
The pretty butterfly for its colorful flutter
The sky for its iridescent ambit
The rainbow for its seven 'me'
Sometimes I wonder if it's me
Or the bodies carrying me
Who is adored more ?
Fuddles me to the core !

One day sitting inside a tiny tube
I was resting inside the dark lube
Suddenly someone pressed me
Scuffled me
Strangled me
Tussled I, came out with a heavy breath
Breathing freely I was at ease
A slender stick with soft fiber
fondled me
A little shy I was at such an endearing gesture
Coaxing me gently
I felt the quiver
I mingled in him in a trice
like the way you gulp a mango slice

No longer I was me, captivated in a color tube
here I was free and liberated
with the slender brush
Oh sorry! a colorful brush
embarked on an advent to a majestic portrait
I was now a colored brush brushing along the shades of me
on a white canvas 
leaving behind my indelible imprints.



Öbrìgadò!
JJJ
 

Sunday

उम्मीद


उम्मीद का तारा दूर गगन में , है सबको दिखता
लेकिन क्या वो तारा है मुझको तकता ?
जब भी देखूँ टिमटिमाते उसको 
आस करे गुदगुदी मुझको 
मानो आस हो उम्मीद की सखी 
संग संग जो खेले आँख मिचौली |

थाम कर हाथ आस का, जाऊं मैं उम्मीद को पकड़ने
चालाक उम्मीद बैठे छिप के खिड़की के पीछे 
खोल दरवाज़ा आहिस्ता , जाऊं मैं धीमे -धीमे 
दबे पाँव आस संग ढूँढूं मैं उम्मीद को 
बैठे जो दूर गगन में खिड़की के पीछे 

ज्यों ही खोलू मैं खिड़की 
त्यों ही उम्मीद मुस्कुराये 
और आस हिलौरें खाए |
तकूँ जब मैं दूर बैठी उम्मीद को
जानू मैं कही तो है इसको देखा पहले 
घुमा के नज़र देखूं जब आस को
तो पाऊँ ये तो है कुछ उम्मीद-सी 
आस लगे उम्मीद की परछाई |

समझ आये कुछ देर के बाद 
ओ बुद्धू ! ये उम्मीद ही तो है आस 
जो आस है, वही तो है उम्मीद 
जो लगे दूर वो सच में है पास 
बस नजरिये की है बात |

आज मिल कर उम्मीद-सी आस से
या यूँ कहूँ आस-सी उम्मीद से
हो रही है बहुत ख़ुशी 
क्यूंकि जिसको ढूंढा गली गली
मिली वो मुझको अपनी गली |




Öbrìgadò!
JJJ
 

Tuesday

Dream On



What doesn't let you sleep is a Dream 
And what drools you in sleep
is a Dream in sleep
Subtle and elusive it is
The power to fantasize the reality
The realm to experience the diversity.

The ghost-driven bike
Or the roller coaster ride 
The merry-merry sack
Or the scary -scary pack
Ambivalent is a Dream
Happily Sad you become 
to find 'dream-come-true-in-dream'
Or Sadistically Happy you go
to discover 'Thank God! It was just a dream'

Dreaming in a dream is reflexive
But living a dream is volunteered
What are you waiting for my dear
Go on to live the dream you cheer!


Öbrìgadò!
JJJ
 

Monday

आस

जब जब मुड़कर देखा पीछे
तब तब पाया तुझे अपने संग
जब जब सजदे में तेरे
झुकाया अपना सर
तब तब पायी तेरी छाँव
तो क्या उन्होंने नहीं किया तेरा सजदा ?

कैसे तू हर पल देता है मेरा साथ
कैसे तू सेह लेता है मेरी रुस्वाई
क्या कभी तू परेशान नहीं होता
मेरी हर चीज़ की मन्नत से

मेरी सुनी तूने तो सुन ले उनकी भी  
क्यों अनसुनी कर दी तूने कुछ की इबादत  
क्या कोई  लॉटरी सिस्टम है तेरे यहाँ
जिसका नंबर लगा, कर दी उसकी मुराद पूरी 
जिसका नहीं लगा, उसको तूने भी कर दिया किनारे

माना की तू सबका मालिक है
पर क्या तेरे अंदर भी हमारी तरह एक दिल है?
अगर है तो क्यों नहीं तू सुनता सच्चे दिल की 
थोड़ी मुहब्बत थोड़ी सी हमदर्दी थोड़ी सी इंसानियत
थोड़ा थोड़ा  ही दे पर दे तो सही 

कब से देख रही हूँ तेरे ही नाम पे हो रही है सियासत
तेरे ही बन्दे बना रहे अपने जैसो को ही बंदी
ये कहाँ की दरियादिली है की तू सबको देता आशीर्वाद
जो किसी को मारे उसे  मिले तेरा साथ
और जो मरे उसे भी मिले तेरा हाथ
समझ नहीं आता अब ये खेल
क्या चाहता है तू?
करुँ तेरी इबादत या हो जाऊं तुझसे रुस्वा
अब तू ही बता करुँ तो क्या करुँ

बस हाथ ना दिखा कुछ तो कर
कब से कतार में खड़े है
अब तो कुछ बोल
अब तो दिखा अपना जलवा
एक आस ही तो है हमारे पास 
ये  टूटती आस  ना टूटने देना
जो ये आस टूटी तो तू भी टूटने से बच ना पाएगा
क्यूंकि आस ही है सबकी सांस , शायद तेरी भी |

 --- सुरभि बाफना

Öbrìgadò!
JJJ
 

Wednesday

लुका छिपी



लुका छिपी का खेल बहुत पुराना
आज फिर याद आया बीता वो जमाना 
कैसे हम पकड़ लेते थे छिपने के लिए एक कोना
और गिनती खत्म होने से पहले पकड़ लेते थे किसी दूसरे का कोना
एक, दो, तीन  .... आ जाऊँ ???
नहीं ! नहीं ! अभी नहीं
मै तो आ रहा हूँ !

यह सुनते ही छोटा सा कोना बन जाता एक कुआँ
समां लेता अपने अंदर एक के ऊपर एक सन्नाटा 

श s श s श ....
हू.... हाउ.... हू....
पता चल गया... कहाँ छिपे हो 
श s श s श ....
पकड़ लिया !

और सन्नाटा बन जाता तू - तू मै - मै का अखाड़ा

तेरी वजह से पकड़े गए...
जा अब तेरी बारी ...
एक, दो, तीन ... आ रहा हूँ
दस तक गिन पूरा .. आती एक आवाज़ 

पसर जाता फिर सन्नाटा और आती भूतिया आवाज़ 
चलती रहती यह लुका छिपी 
जाने कितने कोनो में
फिर सुनी आज यह दबी कहानी 
धूल चाटते कोनों की ज़ुबानी 

 --- सुरभि बाफना

Öbrìgadò!
JJJ

Monday

वो दरवाज़ा



बहुत दिनो से बंद था एक दरवाज़ा
यही इसी कोने वाले कमरे का
रोज़ गुजरती थी उसके आगे से
लेकिन बस देख के नज़रअंदाज़ कर देती थी

देखा- अनदेखा करने की ये लुक्का छिपी
चल रही थी बहुत दिनो से
आज सोचा क्यूँ ना एक तरफ़ा चल रहे इस खेल में
हो जाउँ शामिल मै  भी

खोल दिया मेने वो बंद दरवाज़ा
लेकिन थप्पा देने के लिए कोई और ना था
बस थी कुछ बीती यादें
कहती कुछ सुलझी उनसुलझी बातें

हर तस्वीर से झाँक रहे थे तुम
मै भी थी उनमे
जीभ निकल उसे बिगाड़ने की
नाकाम कोशिश करते हुए

एक धूल चाटता बक्सा भी था
खोला जब उसे तो चर - चरी सी आवाज़ करते हुए उठा गहरी नींद से वो
रखी थी वो सारी किताबें जो तुम मुझे देते थे पढ़ने के लिए
और मै रख दिया करती थी उन्हे इस बक्से में

कभी खुली भी नही थी ये किताबें
आज भी बिलकुल नयी- सी दिख रही थी
बस पन्ने पीले पड़ गये थे
सोचा अधूरी गुफ्तगू कर लेती हू आज पूरी

उठाई एक नयी-सी पुरानी किताब और पलटने लगी  उसके पीले पन्ने
कथा परी कथा जान पड़ रही थी
पर कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी
कमजोर याददाश्त पर डाला जब ज़ोर

तो याद आया यही कहानी तुम्हे सबसे अज़ीज़ थी
जब तब सुनाते रहते थे तुम इसके अंश
जब आख़िरी पन्ना पलटा मेने
तो मुख्या पात्रा के नाम पे था एक गोला

काट के उसका नाम लिखा था तुमने मेरा नाम
तुम्हारी लिखावट पहचानती हू मै आज भी
खुले दरवाज़े से झाकंती रोशनी
चली आई अंदर दबे पाँव

देखना चाहती थी वो भी
दरवाज़े के पीछे मक्कड़ जाल
छोड़ दिया खुला मेने वो कमरा
खोल दिया मेने वो दरवाज़ा |

Öbrìgadò!
JJJ

 

Sunday

आँचल




एक मेहरूनी कपड़ा रखता था मुझे हरदम मेहफ़ूज़ 
मेरे माथे की हर शिकन को छुपा लेता था ये 
हर दर्द हर मुशकिल का हल ढूंढ लेता था ये 
ये तेरा प्यार था या तेरी दुआ 
तेरा आँचल ही था मेरा सरमाया 

तेरे आँचल की भीनी खुशबू 
आज भी उतनी ही ताज़ा लगती है 
जैसे तू कल बैठ मेरे पास
फेर रही थी मेरे बालों में हाथ

कुछ कहने के लिए ज्यों ही सर उठाया मैने 
तो पाया सिर्फ एक मेहरूनी कपड़ा 
बेज़ान सूना फीका-सा एक कपड़ा 
मेरे अश्कों से भीगा एक कपड़ा 

वो साया जो था मेरा सरमाया 
छोड़ गया बस एक मेहरूनी कपड़ा 
बस उसी मेहरूनी कपड़े में 
कर लेता हूँ खुद को कैद 
जब भी होता हूँ खुद से ख़फ़ा |

¡Salud!
JJJ
 

Thursday

Colorful Mirror



The girl out there
Waved at me
Bright and Galvanic was she
Appeared vapid and tepid me
Waived a Hello at me
I wavered and looked around
Yes You! The specky in blue
You look so blue in Blue.
You look pretty pink in pink, I zapped whew
I put on the color to whole me, bragged she
Not like you who just wrap the color around
Excuse me! Who are you??? I grumbled
Oh Common! Put aside your colorful etiquette
Talk to me straight and loud, rumbled I
Yes! Talk to me loud and clear, she repeated the same
Before could I howl at her, the driver honked high
Seated was I at the back peeping into the rear mirror
I got down, paced ahead cutting the crowd
Welcomed was I after such a long
You look pink in blue.


¡Salud!
JJJ
 

Sunday

Happy 2014 Year



The earth reaches the starting point to revolve again
The moon backs the sun with the twinkles again
The dusk follows the dawn
And the clock ticks back twelve again
To mark a new year again.

New hopes, new aspirations
All are set on track
Be  righteous , Be just
Be receptive , Be determined
To mark something new 
To blow the trumpet
That has never been blew.

Today will become yesterday
Yesterday will follow today
Just do that which will make every day
A memorable day.
Compile a year which you will look back
Everytime as the best of your Life.


¡Salud! JJJ
 

इश्क़


इश्क़ एक दरिया है
डूब हमे जाना है
जो ना दुबे
तो रास नहीं आना है
जो डूब गए
तो सांस नहीं आनी है |


Hioy'oy Hoi Polloi
JJJ